गांव की होली जो सिर्फ यादें में रह गई…..

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ये उन दिनों की बात है… जब मौसम और इंसानों के ‘मिजाज़’ आजकल की तरह ‘बेइमान’ नहीं होते थे…! तब न तो शामें ‘उदास’ होती थी और न ही सुबहे बोझिल…! हर किसी के पास अपने ‘किस्से’ होते थे और उन ‘किस्से’ में बसता था एक ‘सपनों’ का संसार..! स्कूल से आते समय कंधे पर ‘बस्ता’ और हाथों में ‘गन्ना’ अक्सर हमारी यात्रा के ‘सहयात्री’ होते थे…! त्योहारों के आते ही हमारी उमंगें भी ‘परवान’ चढ़ने लगती थी…! इधर ‘फ़गुनाहट’ की आहट हुई नहीं कि ही ‘होलिका’ की तैयारियां शुरू हो जाती थी…! इस लिए बच्चा पार्टी पहले तय करती थी कि कौन सा ‘रेंड का पेड़’ होलिका के लिए लाया जाये…! और उसके बाद किसके खेत से ‘गन्ने कि पत्तियों’ को लाना है और किसके ‘खलियान’ से शरपत उठाना है ऐसी तमाम मुद्दों पर चर्चा होती थी…! इन ‘गोपनीय कार्य’ में चाहे कितनी ही ‘खरोंचें’ हाथ में लग जाए उन दिनों ‘परवाह’ किसको थी…! इन सबके बीच जिस बात का सबसे अधिक ‘ख्याल’ रखा जाता था वह यह कि चाहे जैसे भी हो अपने ‘क्षेत्र’ में सबसे ऊँची लपट वाली ‘होलिका’ हमारे ही ‘गांव’ की जलनी चाहिए…! इसके लिए चाहे घर घर जाकर शरपत, पुवाल और गोइंठा ही क्यूं न मांग कर लाना पड़े…! हां, इस दौरान ‘होलिका दहन’ से ठीक कुछ घंटे पहले हुई ‘आपातकालीन बैठक’ में जिन दो ‘मुद्दों पर मंथन’ होता था उनमें, लल्लन चाचा (अब स्वर्गीय) के घर से निर्धारित समय पर ‘शरपत के बोझ’ को उठाना और दूसरा ‘धोबियाना’ की होलिका को लूटना प्रमुख रहता था..! उन दिनों, जलती ‘होलिका’ के बीच से गड़ी हुई ‘रेंड’ को निकलकर उसे गांव की ‘शरहद’ के पार पहुंचना गांव के ‘नवोदित युवाओं’ के उफनते शौर्य का प्रमाण माना जाता था…! (हालांकि इसके पीछे क्या कारण था मुझे आज भी समझ नहीं आया, लेकिन मैंने भी ‘अति उत्साह’ में एक दो बार यह काम करके ‘प्रसंशा’ हासिल की थी।) हां, इस दरम्यान एक और ‘रोचक घटना’ घटित होती थी, वो ये कि गांव के कुछ ऐसे ‘चयनित बुजुर्गों’ को ‘टार्गेट’ कर रात के अंधरे में उनको ‘गोबर’ से नहलाना…! यह मिशन तब कम्प्लीट माना जाता था जब कोई चयनित बुजुर्ग अपने छत पर चढ़कर ‘पुरखों’ से लेकर ‘वर्तमान’ और आने वाली एकाध ‘पीढ़ी’ को पूरे ‘मनोयोग’ से सस्वर याद कर रहा हो..! इधर मिशन सक्सेस हुआ नहीं उधर बिना रुकावट के कई घंटो तक चलने वाले ‘एक्सक्लूसिव गालियों’ के धारा प्रवाह ‘शो’ का लाइव प्रसारण देखने के लिए पूरे गांव जुट जाता था…! यहां एक बात ‘रेखांकित’ करना आवश्यक है, उन दिनों ‘बुजुर्गों’ के मुख से ‘समय, काल व परिस्थितियों’ को ध्यान में रखकर ‘उच्चारित’ होनें वाली ‘गाली’ को पूरे गांव के युवा ‘आशिर्वचन’ समझ कर शिरोधार्य करते थे…! होलिका दहन के अगले दिन सुबह होते ही ‘मंडली’ के जुटने में ज्यादा देर नहीं लगती थी और सबसे अधिक आनंद इस बात में आता था की सबसे पहले किसको और किसने रंगों से ‘लथेरा’ है। सुबह से लेकर दोपहर तक तो रंग कम ‘कीचड़ और गोबर’ की होली अधिक होती थी…। दोपहर में ‘नहाई-धुलाई’ के बाद ‘गुझिया’ और ‘खीर पूरी’ पर हाथ साफ करके मंडली ‘अगले पड़ाव’ पर निकलती थी…! साफ़ झक्क कपड़ों में घर-घर जाकर ‘अबीर-गुलाल’ लगाकर बड़ो से ‘आशिर्वाद’ लेने की प्रक्रिया हमारी शालीनता में चार चांद लगाती थी…! हांलाकि इस दौरान मंडली के जो ‘अति उत्साही’ सदस्य शिव जी के प्रसाद (भांग) का अधिक मात्रा में ‘सेवन’ कर चुके रहते थे वो ‘दुनिया दारी’ से दूर किसी बागीचे में पेड़ के नीचे या किसी के ट्यूबवैल पर ‘बेफिक्र’ चित पड़े रहते थे और ‘आशिर्वाद’ वाले दूसरे सत्र से वंचित रहते थे…! शाम तक रंगों का यह उत्सव उत्साह पूर्वक ऐसे ही चलता रहता था…! कुछ इस तरह बीतती थी हमारे गांव की होली, हालांकि अब ऐसा ‘उत्साह’ नहीं रहता, लेकिन कुछ ‘परंपरायें’ हमारी यादों में अभी भी ‘जीवित’ हैं…!
वैसे तो शुभकामनाओं का कोई रंग नहीं होता, लेकिन सुना है जब ये रंग लाती है तो ज़िंदगी खुशियों के रंगों से भर जाती है..! आप सभी को होली की बहुत-बहुत शुभकामनाएं…! आपका जीवन यूं ही खुशियों से भरा रहे…!

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